परम् पूज्य अनन्त श्री विभूषित यज्ञ सम्राट महामण्डलेश्वर स्वामी श्री प्रखर जी महाराज के विचार

14 March 2019 11:02 Spiritual Desk

परम् पूज्य स्वामी श्री प्रखर जी महाराज ने प्रवचन की श्रंखला को आगे बढ़ाते हुए कहा कि दर्शनार्थी की मनोदशा के अनुसार ही तीर्थ दर्शन के फल का निर्धारण करते हैं। ईश्वर, गुरू एवं तीर्थ सभी के पास दर्शनार्थी को फल प्रदान करने की यही प्रक्रिया है।

महाराज श्री ने साधना को सर्वोच्च धन बताते हुए कहा कि जिसके पास ईश्वर भक्ति अर्थात साधना का अधिकार है उससे धनी इस संसार में और कोई नहीं है। साधना का अधिकार प्राप्त व्यक्ति को ही आध्यात्मिक आयोजनों में सफलता प्राप्त हेती है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन की सुरक्षा के लिए किसी भौतिक हथियार की आवश्यकता नहीं है। साधना की शक्ति रूपी धन जिसके पास है उसके पास शिव कवच, दुर्गा कवच एवं ब्रह्मास्त्र जैसे अचूक अकाट्य हथियार होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि उपासना से बड़ा हथियार कोई नहीं यदि हमारा यही हथियार कमजोर है तो हमारी सुरक्षा काई नहीं कर सकता।

महाराज श्री ने तीर्थो के दर्शन का महत्व समझाते हुए नैमिषारण्य को तीर्थों का राजा बताया। उन्होंने कहा कि नैमिषारण्य से साधक को एक अलौकिक अनुभूति होती है। देवताओं पर राक्षसों द्वारा आक्रमण किए जाने के अवसर का वर्णन करते हुए महाराज श्री ने कहा कि राक्षसों पर विजय प्राप्त करने के लिए इन्द्र को बज्र नामक शस्त्र बनाने के लिए महर्षि दधीचि की हड्डियों की आवश्यकता पड़ी। उसके लिए उन्हें नैमिषारण्य में यज्ञ करना था ताकि शक्ति का आह्वान किया जा सके और महर्षि दधीचि से हड्डी प्राप्त करने के लिए निवेदन कर सकें।

महर्षि दधीचि ने देवताओं को 10 लाख तीर्थों का अभिषेक करने की शर्त रखी। देवताओं ने दधीचि से अनुरोध किया कि यदि वे सभी तीर्थों का आह्वान नैमिषारण्य में ही कर लें तो उन्हें कोई आपत्ति तो नहीं। दधीचि ने सभी देवताओं को इसकी अनुमति दे दी और देवताओं ने सभी तीर्थों का आह्वान कर उन्हें नैमिषारण्य बुला लिया और उनका अभिषेक किया, उसके पश्चात दधीचि ने अपनी देह त्याग कर देवताओं को बज्र बनाने के लिए अपनी हड्डियां प्रदान कीं।

महाराज श्री ने बताया कि नैमिषारण्य के मिश्रिख ताल में स्नान करने का महत्व 10 लाख तीर्थों के जल से स्नान करने के बराबर है।

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